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याद किया जाएगा कोरोना काल:"जब बंद थे मंदिर- मस्जिद और खुली थी मधुशाला"

(डॉ राज कुमार सिंह)


महामारी कोरोना ने घोर कलयुग का एहसास करा दिया। बचपन से सुनता आया था "रामचंद्र कह गए सिया से  ऐसा कलयुग आएगा,हंस चुंगेगा दाना और कौवा मोती खाएगा"। इस समय पता नही हंस को मोती और कौवे को दाना मिला होगा या नही, जब इंसान ही भूख से तड़पकर दम तोड़ रहा हो,तो सृष्टि के बाकी जीवों की क्या दशा हो रही होगी।दुःखद यह है कि वाराणसी में एक व्यक्ति का भूखे कुत्तों ने शिकार कर डाला।कुत्ते भूख से बिलबिलाए थे तथा पेट की आग बुझाने को इंसान पर ही टूट पड़े। इस तरह के समाचार अन्य स्थानों से भी प्राप्त हुए हैं।


कोरोना के कारण आयी मंदी शताब्दी की सबसे बड़ी मंदी बन गयी है।लोगों का घर गया,नौकरी गई,सब चला गया।  सरकार खाने को दे रही है,पर सिर्फ खाना ही सब कुछ नहीं होता है। लोगों को गेंहू, दाल के अतिरिक्त भी जीवन यापन के लिए बहुत कुछ चाहिए,तेल,नमक,सब्जी, दवाई और बहुत कुछ।ऐसे हालात में ह्रदय द्रवित करने वाली खबरें भी बढ़ने लगी हैं। 'गरीबी' से 'हारा गरीब' अपना जीवन समाप्त करने लगा है। यह अत्यंत ही दुखद पहलू है। घर बार छोड़कर परदेश कमाने गए लोगों का भी बुरा हाल है। गांव आने पर जिनको सब सर आंखों पर बिठाते थे, वहीं परदेसी बाबू सरकारी अव्यवस्था के कारण भूख प्यास से तड़पते फटेहाल जब घर पहुँच रहे हैं तो गांव वाले भी पराया कर दे रहे हैं। कह रहे हैं कोरोनावायरस लेकर आए हैं। उन्हें सरकारी व्यवस्था या बगीचों में एकांतवास करना पड़ रहा है।इससे बुरा दिन क्या आएगा। गांव तक पहुंचने से पूर्व ही कईयों ने दम तोड़ दिया तो दुर्घटनाओं में भी अनेक लोगों की जान गई।


यह मंजर कोई कैसे भूल पायेगा।शताब्दियां आँसू बहाएंगी,याद करेंगी।


देश के उस मध्यमवर्ग का भी बुरा हाल है जिसकी बदौलत भारत का विकास दर का आंकड़ा दो अंको तक जाने को था।भारत सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने को था।अब मध्यम वर्ग के समक्ष रोजगार का विकराल संकट खड़ा हो गया है।देश के कमाऊ-पढ़ाऊ पूत को चिंता हो रही है घर का लोन, कार का लोन, मोटरसाइकिल का लोन, मोबाइल का लोन,बच्चों की फीस, किराया,बिजली बिल,मोबाइल बिल कैसे चुकाएंगे।घर का खर्च कैसे चलाएंगे।यदि नौकरी नहीं मिली, रोजगार नहीं चला,सब बर्बाद हो जाएगा। यह मध्यमवर्ग भी अवसाद में जी रहा है। 


जाने क्या होगा,भविष्य अनिश्चित है।


चिंता तो सरकार को भी है अपने राजस्व की। जब किसी के जेब में आमदनी ही नहीं होगी तो टैक्स कहां से आयेगा।जब कोई सामान खरीदेगा ही नहीं जीएसटी कहां से मिलेगी। शायद इसीलिए इस घोर मंडी में, कलयुग में सरकार ने वह कर दिया जो शायद उसे नही करना चाहिए था।आबकारी को कमाई का सबसे बड़ा साधन मान लिया।जनता की चिंता किए बगैर मदिरालय खोल दिए और बेवड़ो को सबसे बड़ा राजस्व दाता मान बैठे।लॉक डाउन की वजह से मंदिर, मस्जिद,चर्च और गुरुद्वारे बन्द हैं,और शराब की दुकाने खुल गयी। इतिहास में यह समय दर्ज हो गया और सदैव काले अक्षरों में लिखा जाएगा।


"ऐसा कोरोना कॉल आया था,जब बंद थे देवालय और खुली हुई थी मधुशाला"।


देश और दुनिया में कोरोना के कारण जो नुकसान हो रहा है या आगे होगा उसे तो फिलहाल रोकने का कोई रास्ता नहीं दिखता,लेकिन लगातार गिरती अर्थव्यवस्था बेरोजगारी के कारण जो समस्याएं उत्पन्न हो रही है या होंगी वह खतरनाक है। देर सवेर कोरोनावायरस का इलाज ढूंढ लिया जाएगा।दवा वैक्सीन बन जाएगी, लेकिन इंसान की मरती इंसानियत को कैसे रोका जाएगा भूखमरी,बेरोजगारी से लाचार- मजबूर इंसान जो करेगा उसकी आप और हम मात्र कल्पना कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि देश में लूट, मारकाट तथा आत्महत्या का दौर देखना बाकी है। यह अब शुरू भी हो चुका है। रेलवे स्टेशनों पर पानी,खाद्य सामग्री तक लूटी जा रही है। मजबूर गरीब,गरीबी से तंग आकर अपने जीवन की लीला समाप्त कर रहे हैं। 


इस माहौल को संभालना अत्यंत ही आवश्यक है वर्ना मानव जीवन और सभ्यता भी संकट में पड़ सकती है।


सरकार को यह देखना चाहिए कि कोरोनावायरस के कारण लॉक डाउन की वजह से जो समस्याएं आयी। वह भविष्य में कभी किसी महामारी के वक्त ना आये। देश की चिकित्सा व्यवस्था को प्राथमिकता के आधार पर ठीक करने की आवश्यकता है। कोरोनावायरस के कारण लॉक डाउन की वजह से देश में सैकड़ों- हजारों ऐसे लोगों की भी जाने गयी, जो अन्य बीमारियों से पीड़ित थे तथा उन्हें अस्पताल बंद होने की वजह से समुचित इलाज नहीं मिल सका।भविष्य में यह तय करना होगा कि कोरोना के इलाज के साथ-साथ अन्य गंभीर रोगों से ग्रसित मरीजों का भी इलाज संभव हो सके,और उन्हें अपनी जान गवानी न पड़े। 


इस समय सबको संयम से काम लेना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि खराब वक्त के बाद अच्छा वक्त समय भी आएगा।


'पतझड़ के बाद हरियाली अवश्य आती है'।

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